सऊदी अरब से भारत तक तेल पाइपलाइन बिछाने की चर्चा हाल के वर्षों में फिर से तेज हो गई है, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण, क्योंकि यह मार्ग वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बेहद संवेदनशील और जोखिमभरा चोकपॉइंट माना जाता है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल का व्यापार होता है। प्रस्तावित ‘MEIDP’ यानी मिडल ईस्ट टू इंडिया डीपवाटर पाइपलाइन परियोजना के तहत यह पाइपलाइन सऊदी अरब से शुरू होकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान से होकर गुजरेगी और फिर ओमान के तट (रास अल-जिफान क्षेत्र) से गहरे अरब सागर के नीचे से होते हुए सीधे भारत के गुजरात तट, जैसे पोरबंदर या आसपास के क्षेत्र तक पहुंचेगी। इस पूरे रूट का सबसे बड़ा उद्देश्य होर्मुज जलमार्ग को पूरी तरह बायपास करना है, ताकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय तनाव या युद्ध जैसी स्थिति में भी तेल आपूर्ति बाधित न हो। यह परियोजना लगभग 1200 से 2000 किलोमीटर लंबी मानी जा रही है, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती समुद्र की गहराई में पाइपलाइन बिछाना, दबाव नियंत्रण बनाए रखना और पाइपों को सुरक्षित रखना होगा क्योंकि डीप सी तकनीक बेहद जटिल और महंगी होती है। आर्थिक दृष्टि से यह दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं में से एक मानी जा सकती है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 5 अरब डॉलर (करीब 40 हजार करोड़ रुपये) से शुरू होकर अगर इसमें रिफाइनरी और अन्य ढांचे भी जोड़े जाएं तो यह खर्च 70 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह भारी निवेश लंबे समय में भारत और खाड़ी देशों दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है क्योंकि इससे समुद्री परिवहन पर निर्भरता कम होगी और हर साल हजारों करोड़ रुपये की बचत संभव होगी। साथ ही, यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी और वैश्विक तेल आपूर्ति को अधिक स्थिर और सुरक्षित बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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