दुनिया भर में क्लाइमेट चेंज से निपटने के तरीके तेजी से बदल रहे हैं और अब बड़ी कंपनियां सिर्फ बाजार से कार्बन क्रेडिट खरीदने के बजाय सीधे जमीन पर काम करके उन्हें तैयार करने पर जोर दे रही हैं। इसी कड़ी में Amazon ने भारत में एक बड़ा कदम उठाया है, जिसके तहत वह करीब 13,000 धान किसानों से कार्बन क्रेडिट खरीदेगी। यह प्रोजेक्ट लगभग 35,000 हेक्टेयर जमीन पर लागू होगा और अनुमान है कि इससे करीब 6.85 लाख टन कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी। इस पहल को Bayer समर्थित “The Good Rice Alliance (TGRA)” के जरिए लागू किया जा रहा है, जिसमें किसानों को ऐसी आधुनिक खेती तकनीक सिखाई जा रही है जिससे धान की खेती में निकलने वाली मीथेन गैस को कम किया जा सके। खास बात यह है कि यही कम हुआ उत्सर्जन “कार्बन क्रेडिट” में बदलता है, जिसे कंपनियां खरीदती हैं—यानी अब किसान सिर्फ फसल ही नहीं, बल्कि “कार्बन बचत” से भी कमाई कर सकते हैं। कार्बन क्रेडिट का मतलब आसान भाषा में समझें तो अगर कोई कंपनी ज्यादा प्रदूषण करती है, तो उसे उतना ही कार्बन कहीं और कम करवाना पड़ता है, ताकि उसका संतुलन बना रहे। पहले कंपनियां ऐसे क्रेडिट बाजार से खरीद लेती थीं, लेकिन अब भरोसे और पारदर्शिता की समस्या के कारण वे सीधे प्रोजेक्ट्स में निवेश कर रही हैं। Amazon भी अब “हाई क्वालिटी” कार्बन क्रेडिट पर फोकस कर रहा है, जिन्हें जमीन पर मापा जा सके और सैटेलाइट के जरिए उनकी निगरानी की जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खेती को एक नए “कार्बन एसेट” के रूप में देखा जाने लगा है, जहां किसान सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में योगदान देकर अतिरिक्त आय भी कमा सकेंगे। हालांकि इस नए मॉडल के साथ कई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। भारत में कृषि क्षेत्र कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का करीब 14% हिस्सा है, इसलिए यहां कार्बन कम करने की बड़ी संभावना जरूर है, लेकिन जमीन पर पारदर्शिता, मॉनिटरिंग और सही भुगतान जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं। कई बार कार्बन क्रेडिट का बड़ा हिस्सा प्रोजेक्ट डेवलपर्स और सर्टिफिकेशन में चला जाता है, जबकि किसानों को अपेक्षाकृत कम फायदा मिलता है। इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन कार्बन क्रेडिट्स का असली मालिक कौन होगा—किसान या कंपनी? सरकार भी इस दिशा में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग का फ्रेमवर्क तैयार कर रही है, लेकिन अभी स्पष्ट नियमों की जरूरत है। कुल मिलाकर, Amazon की यह डील सिर्फ एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि एक बड़े बदलाव का संकेत है—जहां खेती अब सिर्फ अनाज उत्पादन नहीं, बल्कि “क्लाइमेट कमाई” का नया मॉडल बनती जा रही है, और अगर यह सफल हुआ तो भारत ग्लोबल कार्बन मार्केट में एक बड़ा केंद्र बन सकता है।
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