आज जिस “इथेनॉल” की चर्चा देशभर में हो रही है, वह किसी इंसान को नहीं बल्कि आपकी गाड़ी और भविष्य के विमान इंजनों को “नशे” की तरह ताकत देने वाला ईंधन बनता जा रहा है। भारत सरकार अब E20 से आगे बढ़कर E85 (85% इथेनॉल) और यहां तक कि E100 (शुद्ध इथेनॉल) की दिशा में कदम बढ़ा रही है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि आने वाले समय में पेट्रोल सिर्फ तेल नहीं रहेगा, बल्कि उसमें गन्ने और खेतों की खुशबू भी घुली होगी। इसकी जरूरत इसलिए भी बढ़ी क्योंकि कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, खाड़ी देशों में तनाव और डॉलर पर निर्भरता ने भारत के इंपोर्ट बिल को भारी बना दिया है। भारत अपनी लगभग 85-90% तेल जरूरत आयात करता है, ऐसे में इथेनॉल एक “ऊर्जा सुरक्षा कवच” बनकर उभर रहा है। सरकार के अनुसार E20 ब्लेंडिंग से ही हर साल करोड़ों बैरल पेट्रोल आयात कम हुआ है। अब नए ड्राफ्ट नियमों के जरिए E85 और E100 को शामिल करने की तैयारी हो रही है, जिससे देश धीरे-धीरे पारंपरिक पेट्रोल-डीजल से हटकर बायोफ्यूल आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। अगर दुनिया की बात करें तो इस क्षेत्र में सबसे आगे ब्राजील और अमेरिका हैं, जो मिलकर वैश्विक इथेनॉल उत्पादन का लगभग 87% हिस्सा संभालते हैं। ब्राजील ने 1970 के दशक के तेल संकट के बाद ‘Pro-Alcohol’ कार्यक्रम शुरू किया और आज वहां पेट्रोल में 27% तक इथेनॉल मिलाना अनिवार्य है, जबकि अमेरिका में मक्के से इथेनॉल बनता है और वहां करोड़ों फ्लेक्स-फ्यूल वाहन E85 पर चलते हैं। फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों की खासियत यह है कि वे पेट्रोल और इथेनॉल के किसी भी मिश्रण पर चल सकती हैं—चाहे 20%, 85% या 100% इथेनॉल हो। हालांकि इसके लिए इंजन में खास बदलाव होते हैं, जैसे इथेनॉल-प्रतिरोधी पाइप, हाई फ्लो इंजेक्टर, सेंसर और स्मार्ट ECM सिस्टम। इथेनॉल की ऊर्जा पेट्रोल से लगभग 33% कम होती है, इसलिए E85 इस्तेमाल करने पर माइलेज 25-30% तक घट सकता है, लेकिन इसका उच्च ऑक्टेन नंबर इंजन की परफॉर्मेंस बेहतर भी कर सकता है। यही वजह है कि कंपनियां अब फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर तेजी से काम कर रही हैं और आने वाले समय में ये गाड़ियां आम हो सकती हैं। भारत में इथेनॉल क्रांति सिर्फ फ्यूल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह गांव और किसान की अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हुई है। गन्ने और अब मक्का व चावल से इथेनॉल बनाकर किसानों को नया बाजार मिला है, जिससे चीनी मिलों की आय बढ़ी और भुगतान की स्थिति कुछ बेहतर हुई। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं—जैसे मक्का किसानों को MSP से कम कीमत मिलना या चावल से इथेनॉल बनाने में भारी मात्रा में पानी की खपत (एक लीटर इथेनॉल के लिए हजारों लीटर पानी)। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ रहेगा। कुल मिलाकर, इथेनॉल भारत के लिए सिर्फ एक वैकल्पिक ईंधन नहीं बल्कि “आर्थिक गियर बदलने” की रणनीति है, जो देश को आयात निर्भरता से निकालकर आत्मनिर्भर ऊर्जा की ओर ले जा सकती है—लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार कीमत, माइलेज और किसानों के हितों के बीच सही संतुलन बना पाती है या नहीं।
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