दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, खासकर पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ने का असर अब सीधे आम लोगों की थाली तक पहुंचने लगा है। अब तक महंगाई की चर्चा तेल और गैस तक सीमित थी, लेकिन अब खेती में इस्तेमाल होने वाली खाद—खासकर यूरिया—की कीमतों में भारी उछाल ने चिंता बढ़ा दी है। आर्थिक संस्था Capital Economics के अनुसार, यदि यूरिया और अन्य उर्वरकों की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो अगले 12 से 15 महीनों में खाने-पीने की चीजें महंगी हो सकती हैं। हालात यह हैं कि खाद की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है, जिससे बाजार में सट्टा (trading और hedging) भी तेज हो गया है और कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ गया है। यानी आने वाले समय में रोटी, दाल, सब्जी जैसी जरूरी चीजें आम आदमी की पहुंच से और दूर जा सकती हैं। इस तेजी की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और Strait of Hormuz का लगभग बंद होना है, जो दुनिया के लिए बेहद अहम समुद्री मार्ग है। इसके चलते यूरिया की वैश्विक सप्लाई का लगभग एक-तिहाई हिस्सा प्रभावित हुआ है। रिसर्च एजेंसी BMI के मुताबिक, यूरिया की कीमतें फरवरी से अप्रैल के बीच करीब 50% बढ़कर 693 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं, जबकि DAP (डायअमोनियम फॉस्फेट) भी 723 डॉलर प्रति टन हो गया है। वहीं “फ्रंट-मंथ कॉन्ट्रैक्ट” यानी तुरंत डिलीवरी वाले सौदे में कीमतें 76% तक उछल गई हैं। Food and Agriculture Organization (FAO) की रिपोर्ट भी बताती है कि नाइट्रोजन और फॉस्फेट जैसे उर्वरकों की वैश्विक सप्लाई में कमी आ रही है, जिससे खाद्य महंगाई का खतरा और बढ़ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे असर दिखाएगा, लेकिन इसका सबसे ज्यादा बोझ कम आय वाले देशों पर पड़ेगा। यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में उर्वरक लागत 100% से ज्यादा बढ़ चुकी है, जिससे गेहूं, मक्का जैसी फसलों की लागत तेजी से बढ़ रही है। हालांकि ब्राजील में सोयाबीन पर असर कम है, लेकिन कुल मिलाकर खेती की लागत बढ़ने का मतलब है आखिरकार महंगा खाना। अगर सप्लाई जल्दी सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ सकती है। यानी साफ है खाद महंगी हो रही है, और इसका सीधा असर आपकी थाली पर पड़ना लगभग तय है।
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