भारतीय करेंसी यानी रुपया ऐतिहासिक गिरावट के साथ 95.33 प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। इससे पहले करीब एक महीने पहले यह 95.21 तक गिरा था, लेकिन अब उस रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया गया है। इस गिरावट के साथ रुपया एशियाई बाजारों में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन गया है, जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का संकेत है। रुपये की इस कमजोरी का असर सीधे आम लोगों पर पड़ता है, क्योंकि इससे आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं और महंगाई बढ़ती है। रुपये पर दबाव का सबसे बड़ा कारण विदेशी निवेशकों (FII) की भारी बिकवाली है। मार्च और अप्रैल के दौरान विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा निकाल लिए, जो 2025 के पूरे साल के आउटफ्लो से भी ज्यादा है। जब विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये बेचकर डॉलर खरीदते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल यानी ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं, जो पिछले चार साल का उच्च स्तर है। भारत अपनी लगभग 80% तेल जरूरत आयात करता है और भुगतान डॉलर में करता है, इसलिए तेल महंगा होने से डॉलर की मांग और बढ़ती है और रुपये पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाता है। वैश्विक तनाव भी इस गिरावट का बड़ा कारण है, खासकर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर अनिश्चितता ने बाजार में डर का माहौल बना दिया है। इससे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है और कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह स्थिति बनी रहती है और कच्चे तेल की कीमतें 125 डॉलर से ऊपर रहती हैं, तो रुपया 96–97 प्रति डॉलर तक भी गिर सकता है। हालांकि 94.80 एक अहम सपोर्ट लेवल माना जा रहा है, लेकिन फिलहाल वैश्विक हालात को देखते हुए रुपये के जल्दी मजबूत होने की संभावना कम नजर आ रही है।
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