देश में इथेनॉल उत्पादन को लेकर पानी की खपत पर बहस तेज हो गई है, जिसमें अब Indian Sugar Mills Association भी कूद गया है। चावल से एक लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर से ज्यादा पानी खर्च होने के दावे को ISMA ने खारिज किया है, हालांकि इसके समर्थन में ठोस तर्क नहीं दिए गए। दूसरी ओर NITI Aayog की रिपोर्ट और विशेषज्ञों के आंकड़े इस उच्च पानी खपत की ओर इशारा करते हैं। विवाद का केंद्र यह है कि क्या इथेनॉल उत्पादन वास्तव में पानी पर इतना भारी दबाव डाल रहा है, खासकर ऐसे समय में जब देश पहले से ही जल संकट का सामना कर रहा है। ISMA का कहना है कि गन्ने से इथेनॉल बनाना ज्यादा पानी बचाने वाला विकल्प है। संगठन के अनुसार पारंपरिक सिंचाई में 1 लीटर इथेनॉल के लिए करीब 2,469 लीटर पानी लगता है, जो ड्रिप सिंचाई से घटकर 1,634 लीटर तक आ सकता है। लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या पूरे देश में किसान ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीक अपना सकते हैं, क्योंकि इसके लिए भारी निवेश और संसाधनों की जरूरत होती है। वहीं आलोचकों का कहना है कि इंडस्ट्री अपनी तकनीक सुधारने के बजाय किसानों पर ही जिम्मेदारी डाल रही है। असल गणित यह बताता है कि 1 किलो चावल उगाने में लगभग 5,000 लीटर पानी लगता है और 1 लीटर इथेनॉल बनाने के लिए करीब 2.5 किलो चावल की जरूरत होती है। इस आधार पर 1 लीटर इथेनॉल के लिए 10,000 लीटर से अधिक पानी की खपत का आंकड़ा सामने आता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इथेनॉल उत्पादन में “2G तकनीक” (एग्रीकल्चर वेस्ट से उत्पादन) को बढ़ावा दिया जाए, तो न सिर्फ पानी की बचत होगी बल्कि पराली जैसी समस्याओं का समाधान भी संभव है। कुल मिलाकर, यह बहस अब सिर्फ उद्योग बनाम किसान नहीं, बल्कि जल संरक्षण और टिकाऊ कृषि नीति का बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।
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