वंदे मातरम् का संदेश फैलाया। 1915 में गांधीजी के भारत लौटने के बाद स्वदेशी आंदोलन को नया रूप मिला। उन्होंने खादी और चरखा को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक बनाया। असहयोग आंदोलन और दांडी यात्रा में स्वदेशी को राष्ट्रीय एकता और आत्मसम्मान का प्रतीक बनाया गया।स्वतंत्र भारत में शिक्षा, उद्योग और कृषि में सुधार के जरिए आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिला। पंचवर्षीय योजनाओं, हरित, श्वेत और नीली क्रांति ने देश की आर्थिक नींव मजबूत की। 1991 में उदारीकरण के बाद स्वदेशी का मतलब केवल विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं रहा, बल्कि स्थानीय उद्योग, रोजगार और ग्रामीण विकास का प्रतीक बन गया। इसके बाद मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल जैसी पहलों ने इसे 21वीं सदी में राष्ट्रीय विकास नीति का हिस्सा बना दिया।आज भारत में रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, नवीकरणीय ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी उत्पादन को नई गति मिली है। INS विक्रांत और DRDO की उपलब्धियां आत्मनिर्भरता के उदाहरण हैं। डिजिटल इंडिया और ई-कॉमर्स ने ग्रामीण और महिला उद्यमियों को वैश्विक बाजार तक पहुँचाया। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, महिलाओं की वित्तीय भागीदारी और समाज में समानता बढ़ी है।स्वदेशी 2.0 ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब महिलाएं और ग्रामीण सशक्त होते हैं, तो राष्ट्र भी मजबूत होता है। आज स्वदेशी केवल पुराने विचार का पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर, सक्षम और वैश्विक स्तर पर प्रेरणास्रोत भारत का प्रतीक है। 1905 से 2025 तक भारत की यह यात्रा स्वदेशी के निरंतर विकास और नई पहचान की मिसाल है।
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