केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड CBSE ने नई शिक्षा नीति National Education Policy 2020 के तहत ‘थ्री-लैंग्वेज फॉर्मूला’ को सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, जिससे स्कूलों में भाषा चयन को लेकर बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। नए नियम के अनुसार कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी जरूरी हैं। इसका मतलब यह है कि अब फ्रेंच, जर्मन या स्पेनिश जैसी विदेशी भाषाओं को तीसरी अनिवार्य भाषा के रूप में नहीं चुना जा सकेगा, बल्कि उनकी जगह संस्कृत या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं जैसे तमिल, कन्नड़, मराठी, बंगाली आदि को प्राथमिकता दी जाएगी। हालांकि विदेशी भाषाएं पूरी तरह खत्म नहीं होंगी, बल्कि उन्हें अतिरिक्त या चौथी भाषा के रूप में पढ़ा जा सकेगा।
इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य छात्रों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और भारतीय भाषाई विविधता से जोड़ना है, ताकि उनका मानसिक और सांस्कृतिक विकास बेहतर हो सके। वहीं, इस फैसले से निजी स्कूलों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो गई हैं, क्योंकि उन्हें अब भारतीय भाषाओं के शिक्षकों की नियुक्ति और प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी। अभिभावकों की राय भी इस मुद्दे पर बंटी हुई है कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति के लिए सकारात्मक कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ को चिंता है कि इससे बच्चों के अंतरराष्ट्रीय अवसर प्रभावित हो सकते हैं। कुल मिलाकर आने वाले शैक्षणिक सत्र से स्कूलों को नए नियम के अनुसार अपने सिलेबस, टाइम-टेबल और टीचर मैनेजमेंट में बदलाव करना होगा।
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