महिला आरक्षण पर गहलोत की चेतावनी: दक्षिण जैसा आंदोलन दोबारा न हो

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने महिला आरक्षण विधेयक को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के लिए बुलाया गया विशेष सत्र संवेदनशील मुद्दे को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने जैसा है। गहलोत ने खास तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि अगर दक्षिण भारत के राज्यों की आशंकाओं को नजरअंदाज किया गया, तो 1950-60 के दशक जैसे आंदोलन फिर से खड़े हो सकते हैं। उनका कहना है कि दक्षिण के लोगों में पहले से ही यह भावना बन सकती है कि उत्तर भारत उन पर अपनी नीतियां थोप रहा है, जिससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ सकता है।

गहलोत ने सरकार के उस फैसले पर भी सवाल उठाया, जिसमें 2021 की जनगणना के बजाय 2011 की जनसंख्या के आधार पर परिसीमन और आरक्षण लागू करने की बात की जा रही है। उन्होंने कहा कि जब 2023 में कानून लाया गया था, तब साफ कहा गया था कि पहले नई जनगणना होगी और उसी आधार पर आरक्षण लागू किया जाएगा। लेकिन अब अचानक पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल करना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब जनगणना 2027 तक पूरी हो सकती है, तो फिर इंतजार क्यों नहीं किया जा रहा।

इसके अलावा, गहलोत ने चुनावी माहौल के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाने पर भी आपत्ति जताई। उनका मानना है कि जब कई राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, तब इस तरह का महत्वपूर्ण विधेयक लाना उचित नहीं है और इससे राजनीतिक मंशा पर संदेह होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे का इस्तेमाल विपक्ष को घेरने के लिए कर रही है। गहलोत ने दोहराया कि सभी दल महिलाओं को 33% आरक्षण देने के पक्ष में हैं, लेकिन इसे लागू करने का तरीका पारदर्शी और सहमति से होना चाहिए, ताकि देश में किसी तरह का क्षेत्रीय या राजनीतिक तनाव पैदा न हो।


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