भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुआ ‘वॉयजेस’ समझौता देश के समुद्री, शिपबिल्डिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में एक बड़े बदलाव की शुरुआत माना जा रहा है। इस समझौते के तहत दोनों देश मिलकर हाई-टेक क्रेन, आधुनिक जहाज और पोर्ट से जुड़ी उन्नत तकनीकों का विकास भारत में ही करेंगे, जिससे लंबे समय से चली आ रही चीन पर निर्भरता कम होगी, क्योंकि अभी तक भारत अपनी पोर्ट क्रेनों का 90% से ज्यादा आयात चीन से करता था। इस डील में भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड जैसी भारतीय कंपनी और कोरिया की बड़ी शिपबिल्डिंग कंपनियां मिलकर अगली पीढ़ी की पारंपरिक और ऑटोमेटेड क्रेन डिजाइन और तैयार करेंगी, जिससे देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा और लागत व समय दोनों की बचत होगी। साथ ही, कोरियाई कंपनियों को भारत में जहाज पंजीकरण, पोर्ट डेवलपमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया गया है,
जिसमें महाराष्ट्र का वधावन पोर्ट, ओडिशा का बाहुदा टर्मिनल और गुजरात का दीनदयाल पोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं। इससे न केवल बंदरगाहों की क्षमता बढ़ेगी बल्कि भारत के 3.20 लाख से अधिक नाविकों के लिए रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। इसके अलावा, यह समझौता हरित तकनीक और जलवायु निवेश से भी जुड़ा है, जो पेरिस समझौता के तहत भारत को अंतरराष्ट्रीय फंडिंग और कार्बन क्रेडिट बाजार में मजबूत स्थिति दिलाने में मदद करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण कोरिया की उन्नत शिपबिल्डिंग तकनीक—खासकर एलएनजी कैरियर्स और बड़े कंटेनर जहाजों में उसकी मजबूत पकड़—भारत के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी। कुल मिलाकर, ‘वॉयजेस’ समझौता भारत को आत्मनिर्भर बनाने, वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी भूमिका मजबूत करने और भविष्य में उसे एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग व समुद्री हब के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम है।
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