भारत में ₹40 करोड़ का रिटायरमेंट फंड सुनने में भले ही बहुत बड़ा लगे, लेकिन गणित के हिसाब से यह लक्ष्य गलत नहीं है। निवेश विशेषज्ञ Sandeep Jethwani के अनुसार बढ़ती महंगाई, हेल्थकेयर खर्च और लंबी उम्र को देखते हुए भविष्य में आरामदायक जीवन के लिए इतनी बड़ी राशि की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन असली समस्या खर्च नहीं, बल्कि कमाई है। भारत अभी भी लो-टू-मिडिल इनकम इकोनॉमी है, जबकि यह हाई-इनकम रिटायरमेंट टारगेट को हासिल करने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि ज्यादातर लोग ₹3 करोड़ तक भी बचत नहीं कर पा रहे, ₹40 करोड़ तो बहुत दूर की बात है। रिपोर्ट्स जैसे PLFS 2025 और Unstop Talent Report 2026 इस अंतर को साफ दिखाती हैं। देश में केवल करीब 57% कामकाजी उम्र के लोग ही रोजगार में हैं और युवाओं (15–29 वर्ष) में यह आंकड़ा 41% के आसपास है। नौकरी पाने के बाद भी स्थिति आसान नहीं है—लगभग 84% ग्रेजुएट, 85% इंजीनियरिंग और 74% MBA छात्र प्लेसमेंट नहीं पा रहे। जो नौकरी मिलती भी है, उसमें 90% छात्र कम सैलरी पर समझौता करने को तैयार हैं। यानी नौकरी मिलना ही बड़ी चुनौती बन चुका है। अगर सैलरी की बात करें तो हकीकत और भी साफ हो जाती है। सामान्य ग्रेजुएट ₹3–5 लाख सालाना, BTech ₹4–7 लाख और MBA ₹6–12 लाख के बीच कमा रहे हैं। सरकारी नौकरियों में स्थिरता जरूर है, लेकिन शुरुआती वेतन ₹3–6 लाख और मिड-लेवल पर ₹6–12 लाख तक ही रहता है। वहीं, देश के कई परिवारों की औसत मासिक आय ₹15,000–20,000 के बीच है। ऐसे में लंबी अवधि तक बड़ी बचत करना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि ₹40 करोड़ का लक्ष्य आम लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं बन पाता। असल समस्या नौकरी की संख्या नहीं, बल्कि जॉब क्वालिटी और इनकम लेवल है। ज्यादातर लोग अनौपचारिक या अस्थिर काम में लगे हैं, जहां नियमित आय नहीं होती। सैलरी ग्रोथ भी आमतौर पर 8–12% ही रहती है, जबकि बड़ी छलांग सिर्फ कुछ खास स्किल्स (जैसे AI, टेक) में देखने को मिलती है। इसलिए ₹40 करोड़ का लक्ष्य केवल टॉप प्रोफेशनल्स, बिजनेस ओनर्स या हाई-स्किल लोगों के लिए ही संभव है। बाकी लोगों के लिए यह एक “थ्योरी” ज्यादा है, रियलिटी कम।
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