स्वदेशी शोध संस्थान में आयोजित इस विशेष व्याख्यान में यह विस्तार से बताया गया कि भारत की प्राचीन दार्शनिक परंपराएँ केवल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन ही नहीं करतीं, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता और सामरिक दृढ़ता का भी गहन आधार प्रस्तुत करती हैं। वक्ताओं ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय दर्शन में आत्मनिर्भरता कोई नया विचार नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से भारतीय समाज के संरचनात्मक ढांचे का मूल तत्व रहा है। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता का सिद्धांत सिर्फ व्यापार या उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक सामंजस्य से सीधा जुड़ा हुआ है। वक्ता ने यह भी समझाया कि भारत की दार्शनिक दृष्टि व्यक्तियों और समाज को आत्मबल, श्रम-सम्मान, संसाधनों के संतुलित उपयोग और स्थानीय क्षमताओं के विकास की ओर प्रेरित करती है। इस विचार के अनुसार, जो समाज अपनी आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करता है, वह किसी भी बाहरी दबाव, संकट या सामरिक खतरे का सामना अधिक दृढ़ता और आत्मविश्वास के साथ कर सकता है।
सत्र में भारत के प्राचीन और मध्यकालीन व्यापार मॉडल पर भी गहराई से चर्चा की गई, जहाँ शहरों, ग्राम पंचायतों, कारीगरों और व्यापारिक समुदायों की परस्पर सहयोग पर आधारित अर्थव्यवस्था ने भारत को विश्व व्यापार का केंद्र बनाया था। वक्ताओं ने बताया कि स्वदेशी सोच केवल घरेलू उत्पादन तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण है, जिसमें संसाधनों का स्थानीय प्रबंधन, स्थानीय कौशल का संरक्षण, समुदाय आधारित व्यापार और रोजगार की मजबूती महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि स्वदेशी मॉडल विदेशी निर्भरता को कम करके राष्ट्र की सामरिक सुरक्षा को मजबूत करता है, क्योंकि आर्थिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र ही वास्तविक रूप से रणनीतिक रूप से स्वतंत्र कहा जा सकता है। व्याख्यान में उपस्थित प्रतिभागियों ने महसूस किया कि वर्तमान समय में जब दुनिया व्यापक आपूर्ति-श्रृंखला संकटों, आर्थिक अनिश्चितताओं और सामरिक तनावों से गुजर रही है, भारत की पारंपरिक स्वदेशी सोच और आर्थिक संरचना आधुनिक समय की बड़ी चुनौतियों का समाधान बन सकती है। निर्णायक रूप से, व्याख्यान ने यह संदेश दिया कि भारत की प्राचीन आर्थिक बुद्धिमत्ता आज भी प्रासंगिक है और आत्मनिर्भरता ही भविष्य की सबसे मजबूत रक्षा है।
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