आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कोलकाता में दिए अपने संबोधन में कहा कि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है और इसे घोषित करने के लिए किसी भी प्रकार के संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘हिंदू’ शब्द किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान, जीवन मूल्यों और सभ्यतागत परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। भागवत ने दोहराया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं है और न ही वह सत्ता की राजनीति में हस्तक्षेप करता है।
उन्होंने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, मातृभाषाओं, सामाजिक समरसता और नैतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कार्य करना है। साथ ही, उन्होंने समाज में आरएसएस को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने का आह्वान करते हुए कहा कि संगठन का कार्य समाज को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने पर केंद्रित है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान भारत की सांस्कृतिक पहचान और राष्ट्रवाद को लेकर चल रही वैचारिक चर्चा को एक बार फिर केंद्र में ले आया है और आने वाले समय में इस पर व्यापक सार्वजनिक विमर्श देखने को मिल सकता है।
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