राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सामाजिक सौहार्द और मातृभाषा के उपयोग पर विशेष जोर दिया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारत की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है और देश की सभी भारतीय भाषाएं समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। किसी एक भाषा को श्रेष्ठ या अन्य को गौण मानना भारतीय संस्कृति की मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मातृभाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और पहचान की आत्मा होती है।
मोहन भागवत ने कहा कि सामाजिक सौहार्द तभी संभव है जब समाज के सभी वर्ग एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति और विचारों का सम्मान करें। उन्होंने शिक्षा, सामाजिक जीवन और सार्वजनिक संवाद में मातृभाषा के अधिकाधिक उपयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इससे न केवल विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति होती है, बल्कि समाज में अपनापन और एकता भी मजबूत होती है। उनके अनुसार, मातृभाषा में सोचने और कार्य करने से व्यक्तित्व का समग्र विकास होता है और नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहती है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज के वैश्विक दौर में विदेशी भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषाओं को पीछे छोड़ दें। संतुलन बनाए रखते हुए भारतीय भाषाओं को सम्मान और प्राथमिकता देना ही सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता का मार्ग है। विशेषज्ञों के अनुसार, मोहन भागवत का यह संदेश सामाजिक एकता, भाषाई सम्मान और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण विचारधारा को सामने रखता है, जो बदलते समय में भारतीय समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
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