सम्मेलन में उपस्थित संतों और समाजसेवियों ने इस बात पर जोर दिया कि वास्तविक राष्ट्रभक्ति केवल नारों में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में होनी चाहिए।
शताब्दी वर्ष के इन कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के हर वर्ग—विशेषकर युवाओं और महिलाओं—को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चार और शंखनाद के साथ हुई।"स्वदेशी केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि एक विचार है। जब हम स्वदेशी अपनाते हैं, तो हम सीधे तौर पर अपने देश के किसान और मजदूर के हाथ मजबूत करते हैं।"
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