बंगाल के मालदा जिले में एसआईआर (Special Summary Revision) के काम में लगे सात न्यायिक अधिकारियों को घेरने और उन पर हमला करने की घटना ने पूरे देश में चिंता पैदा कर दी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है और इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि न्यायपालिका को डराने-धमकाने और न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। कोर्ट ने कहा कि इस घटना ने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और न्यायिक प्रक्रिया को सीधे चुनौती दी है।
घटना बुधवार दोपहर के समय कालिया चौक इलाके, मालदा में हुई, जब असामाजिक तत्वों ने सात न्यायिक अधिकारियों को घेर लिया, जिनमें तीन महिला अधिकारी भी शामिल थीं। अधिकारियों को देर रात तक बंधक बनाए रखा गया, उनके वाहनों पर पथराव और लाठी-डंडों से हमला किया गया, और उन्हें खाना-पानी तक नहीं दिया गया। इस घटना ने न्यायिक अधिकारियों और उनके परिवारों में गहरा डर पैदा कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह एसआईआर में लगे अधिकारियों और उनके परिवारों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती करे। साथ ही कोर्ट ने कहा कि मालदा की घटना की जांच सीबीआई या एनआईए को सौंपे और प्रारंभिक रिपोर्ट सीधे कोर्ट को प्रस्तुत करे।
कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया और छह अप्रैल तक स्पष्टीकरण पेश करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन और पुलिस की निष्क्रियता पर कड़ी फटकार लगाई और कहा कि मालदा जिले में कानून-व्यवस्था तंत्र पूरी तरह चरमरा गया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यह घटना सामान्य विरोध-प्रदर्शन नहीं थी बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने और अधिकारियों का मनोबल गिराने की सुनियोजित रणनीति थी। कोर्ट ने भीड़ नियंत्रण के लिए सख्त आदेश दिए, जैसे कि एसआईआर सुनवाई के दौरान एक समय में पांच से अधिक लोगों को प्रवेश न दिया जाए और पांच से अधिक लोगों के जमावड़े पर रोक लगाई जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिकारियों को घटना की जानकारी होने के बावजूद तत्काल कार्रवाई नहीं की गई। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि प्रशासन की निष्क्रियता और राजनीतिक हस्तक्षेप ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि यह विरोध-प्रदर्शन गैर-राजनीतिक था, तो राजनीतिक नेता वहां क्यों उपस्थित थे और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उनका क्या योगदान था।
बंगाल, ओडिशा और झारखंड में चल रही एसआईआर प्रक्रिया में 700 से अधिक न्यायिक अधिकारी तैनात हैं, ताकि 60 लाख से अधिक मतदाता आपत्तियों से निपटा जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को राज्य के ध्रुवीकृत राजनीतिक माहौल और प्रशासन की असावधानी के रूप में देखा और कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सुरक्षा सर्वोपरि है।
न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्वतंत्रता पर किसी भी तरह का राजनीतिक या असामाजिक हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासन को कड़ा संदेश देते हुए सुनिश्चित किया कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
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