कुरुक्षेत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन, ऋषियों और ज्ञान की भूमिः श्याम सिंह राणा
कुरुक्षेत्र की संस्कृति और आस्था को विश्व के सामने लाने की आवश्यकताः स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज
कुरुक्षेत्र भारत की सांस्कृतिक राजधानी और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय इसका केंद्र बिंदुः भारत भूषण भारती
कुरुक्षेत्र व भगवद्गीता भारत की पहचान के प्रतीकः श्री सतीश
कुरुक्षेत्र क्षेत्र ने बाबा बंदा सिंह बहादुर के आंदोलन में निभाई अहम भूमिकाः प्रो. अमरजीत सिंह
तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का हुआ समापन
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सोमनाथ सचदेवा के मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में “कुरुक्षेत्र: थ्रू द एजेस” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का विधिवत समापन हुआ। इस सम्मेलन का आयोजन भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर), नई दिल्ली, श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन केंद्र, स्वदेशी शोध संस्थान, जिओ गीता तथा विजन कुरुक्षेत्र के सहयोग से किया गया, जबकि इसकी फंडिंग आईसीएचआर, नई दिल्ली द्वारा की गई।
समापन सत्र की शुरुआत दीप प्रज्वलन और कुलगीत के साथ हुई, जिसके बाद राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् का गायन किया गया। कार्यक्रम के दौरान अतिथियों को पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया। विजन कुरुक्षेत्र के अध्यक्ष श्री मदन मोहन छाबड़ा ने प्रतिभागियों एवं अतिथियों का स्वागत किया। इस अवसर पर जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा प्रकाशित तीन दिवसीय सम्मेलन के विशेष न्यूज पेपर का भी अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि हरियाणा के पशुपालन एवं डेयरी मंत्री श्याम सिंह राणा ने कहा कि कुरुक्षेत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली है तथा यह भूमि ऋषियों-मुनियों की तपोभूमि रही है। इसी पावन धरती पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का दिव्य संदेश दिया, जो मानव जीवन को कर्तव्य, धर्म और शांति का मार्ग दिखाता है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की पहचान प्राचीन काल से ही कृषि, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र के रूप में रही है।
उन्होंने बताया कि हरियाणा सरकार ने किसानों के हित में अनेक योजनाएं लागू की हैं। लगभग 10 करोड़ रुपये की लागत से खेतों तक जाने वाले रास्तों का विकास कराया गया है, जिससे किसानों को अपनी फसल खेतों से मंडियों तक ले जाने में सुविधा हुई है। ‘मेरी फसल मेरा ब्यौरा’ योजना के माध्यम से किसानों की फसलों का रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज किया जा रहा है और भुगतान सीधे उनके बैंक खातों में किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि हम भगवद्गीता के निष्काम कर्म के संदेश को अपनाकर कार्य करें तो समाज और राष्ट्र दोनों का विकास संभव है और भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज ने कहा कि किसी भी स्थान और परंपरा को सही रूप में समझने के लिए उसे मूल रूप में जाकर देखना और अनुभव करना आवश्यक होता है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की संस्कृति अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र की आस्था, पवित्रता और ऐतिहासिक तथ्यों को विश्व के सामने प्रस्तुत करने की आवश्यकता है, ताकि पूरी दुनिया इस भूमि के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को समझ सके।
विशिष्ट अतिथि हरियाणा के मुख्यमंत्री के ओएसडी भारत भूषण भारती ने कहा कि भारत प्राचीन काल से ही विश्वगुरु रहा है और भविष्य में भी इस भूमिका को निभाने की क्षमता रखता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विश्व जिन संकटों और संघर्षों से गुजर रहा है, उनमें श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश मानवता को शांति और समाधान का मार्ग दिखा सकता है। उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में जाना जाता है और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय इस सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संगठक एवं प्रसिद्ध आर्थिक विशेषज्ञ श्री सतीश ने कहा कि कुरुक्षेत्र के समग्र विकास के लिए उसके गौरवशाली इतिहास का गंभीर अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अमेरिका का इतिहास लगभग 450 वर्ष और इंग्लैंड का लगभग 1000 वर्ष पुराना है, जबकि कुरुक्षेत्र में हुआ महाभारत का महान युद्ध लगभग 5128 वर्ष पूर्व हुआ था। इस दृष्टि से कुरुक्षेत्र, गीता और भारत विश्व की अत्यंत प्राचीन सभ्यताओं के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार रोम और मक्का जैसे धार्मिक स्थलों का वैश्विक महत्व है, उसी प्रकार कुरुक्षेत्र के महत्व को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की आवश्यकता है।
समापन सत्र का मुख्य व्याख्यान देते हुए देश भगत विश्वविद्यालय, मंडी गोबिंदगढ़ (पंजाब) के प्रो-वाइस चांसलर प्रो. अमरजीत सिंह ने कहा कि नांदेड से प्रस्थान करने के बाद बाबा बंदा सिंह बहादुर खरखौदा और थानेसर होते हुए लौहगढ़ तक पहुंचे। इस दौरान कुरुक्षेत्र क्षेत्र की जनता ने उनका सम्मान किया और उनके आंदोलन को सहयोग दिया। उन्होंने बताया कि थानेसर में बाबा बंदा सिंह बहादुर ने अपने सहयोगी राम सिंह को फौजदार नियुक्त किया। उन्होंने यह भी कहा कि लाडवा और थानेसर क्षेत्रों में लोगों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह किया, जो हरियाणा के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
कर्नल अरुण वशिष्ठ ने कहा कि धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र पवित्र भूमि है, जहां रहने वाला व्यक्ति आध्यात्मिक विचारधारा के साथ आगे बढ़ता है। उन्होंने कहा कि भगवद्गीता केवल युद्ध का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला संदेश है।
सम्मेलन के तीन दिनों की गतिविधियों की संक्षिप्त रिपोर्ट सम्मेलन निदेशक एवं विभागाध्यक्ष प्रो. भगत सिंह ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम के अंत में श्रीमद्भगवद्गीता अध्ययन केंद्र के प्रभारी एवं आयोजन सचिव प्रो. आर.के. देसवाल ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. ईश्वर शरण विश्वकर्मा, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव लेफ्टिनेंट (डॉ.) वीरेंद्र पाल, छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. ए.आर. चौधरी, डीन ऑफ कॉलेजिज प्रो. ब्रजेश साहनी, प्रो. कृष्णा देवी, प्रो. अमित लूदरी, प्रो. सीडीएस कौशल, प्रो. शुचिस्मिता, लोक सम्पर्क विभाग के निदेशक प्रो. महासिंह पूनिया, प्रो. रणवीर सिंह, डॉ. गोपाल प्रसाद, डॉ. रमेश सिरोही, डॉ. रामचन्द्र, डॉ. जितेन्द्र जांगडा, सहित अनेक शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
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