धीरूभाई अंबानी शून्य से शिखर तक का महासफर
धीरूभाई अंबानी का जीवन संघर्ष, साहस और असाधारण दूरदर्शिता की एक ऐसी गाथा है जो दुनिया भर के उद्यमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। गुजरात के एक छोटे से गाँव में शिक्षक के घर जन्मे धीरूभाई का बचपन आर्थिक तंगी में बीता, यहाँ तक कि उन्हें मेलों में भजिया तक बेचना पड़ा। 16 साल की उम्र में वे सुनहरे भविष्य की तलाश में यमन के एडेन शहर चले गए, जहाँ उन्होंने एक पेट्रोल पंप पर महज ₹300 प्रति माह की नौकरी की। लेकिन उनका लक्ष्य सिर्फ पेट पालना नहीं था; वे अक्सर बड़े होटलों में चाय पीने जाते थे ताकि वहां बैठकर बड़े व्यापारियों की बातें सुन सकें और बिज़नेस की बारीकियां समझ सकें।
1958 में जब वे भारत लौटे, तो उनके पास बहुत कम पूंजी थी लेकिन सपने हिमालय जैसे ऊँचे थे। उन्होंने मुंबई में 'रिलायंस कमर्शियल कॉरपोरेशन' की शुरुआत एक छोटे से 350 वर्ग फुट के कमरे से की, जिसमें सिर्फ एक मेज और तीन कुर्सियां थीं। उन्होंने मसालों के निर्यात से शुरुआत की और फिर पॉलिएस्टर सूत के कारोबार में हाथ आजमाया। 1966 में अहमदाबाद के नरोदा में अपनी पहली टेक्सटाइल मिल शुरू की और 'विमल' (Vimal) ब्रांड लॉन्च किया, जो देखते ही देखते भारत का सबसे भरोसेमंद नाम बन गया।
धीरूभाई की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने शेयर बाजार को आम आदमी तक पहुँचाया। 1977 में जब रिलायंस का IPO आया, तो उन्होंने लाखों छोटे निवेशकों को अपने साथ जोड़ा और उन्हें अमीर बनाया। उन्होंने 'बैकवर्ड इंटीग्रेशन' की रणनीति अपनाकर कपड़े से पेट्रोकेमिकल्स और रिफाइनिंग तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। "बड़ा सोचो, जल्दी सोचो और दूसरों से आगे सोचो" के मंत्र पर चलने वाले धीरूभाई ने शून्य से शुरुआत कर रिलायंस को भारत की पहली ऐसी कंपनी बनाया जिसे फॉर्च्यून 500 सूची में जगह मिली। उनकी कहानी यह साबित करती है कि इंसान की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके बड़े सपनों और उन्हें पूरा करने की अटूट जिद से होती है।