ईरान में चल रहे युद्ध का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है, जिससे पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की स्थिति बनती नजर आ रही है। मौजूदा हालात में ग्लोबल ऑयल प्रोडक्शन में रोजाना करीब 1.1 करोड़ बैरल की भारी कमी आ गई है, जिसके कारण सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो रही है और कई देशों को ईंधन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस समय युद्ध रुक भी जाता है, तब भी हालात सामान्य होने में कम से कम छह महीने का समय लग सकता है, क्योंकि उत्पादन और सप्लाई को फिर से स्थिर होने में समय लगेगा।
भारत के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि देश अपनी कुल जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से एक बड़ा हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते आता है, जो इस समय सबसे संवेदनशील और जोखिम भरा क्षेत्र बना हुआ है। यदि इस मार्ग पर बाधा बनी रहती है, तो भारत में तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में और बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, मौजूदा हालात जल्द सुधरते नहीं दिख रहे हैं, क्योंकि कई तेल टैंकर इस खतरनाक रास्ते से गुजरने से बच रहे हैं, जिससे सप्लाई और सीमित होती जा रही है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है और आगे भी इसमें तेजी की संभावना जताई जा रही है।
यदि उत्पादन में और कटौती होती है या सप्लाई में बाधा बनी रहती है, तो आने वाले समय में महंगाई बढ़ने का खतरा और गहरा सकता है। कुल मिलाकर, यह संकट केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर भी इसका व्यापक असर पड़ सकता है।