थोक महंगाई 38 महीने के उच्च स्तर पर, ईंधन और कच्चे तेल की कीमतों से दबाव बढ़ा

13 प्रतिशत थी, यानी एक महीने में ही महंगाई में तेज उछाल देखने को मिला। इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और ईंधन की कीमतों में तेजी है, जिस पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई से जुड़ी अनिश्चितताओं का सीधा असर पड़ा है। खास बात यह है कि ईंधन और बिजली सेक्टर, जो पिछले कई महीनों से गिरावट में था, अब तेजी से ऊपर आया है और महंगाई को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है।

इसके साथ ही विनिर्मित उत्पादों की कीमतों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो 40 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। इसका मतलब है कि उद्योगों की लागत बढ़ रही है, और आने वाले समय में इसका असर आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है। प्राथमिक वस्तुओं, खासकर कृषि और खाद्य उत्पादों में भी दबाव बना हुआ है, हालांकि कुछ खाद्य वस्तुओं में गिरावट ने थोड़ी राहत जरूर दी है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाएं जारी रहती हैं, तो महंगाई का दबाव अभी खत्म नहीं होने वाला।

आगे की स्थिति को लेकर भी चिंताएं बनी हुई हैं। कमजोर मानसून की आशंका खाद्य महंगाई को और बढ़ा सकती है, जिससे आम लोगों के खर्च में और इजाफा होगा। इसके अलावा आयात लागत बढ़ने और लॉजिस्टिक्स महंगे होने से भी कीमतों पर असर पड़ेगा। कुल मिलाकर, थोक महंगाई में आई यह तेज बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई भी बढ़ सकती है, जिससे आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा और सरकार व नीति निर्माताओं के लिए इसे नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।




Manisha Saini
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