13% थी, यानी एक ही महीने में महंगाई में तेज उछाल देखने को मिला और यह अर्थशास्त्रियों के अनुमान से भी ज्यादा रही। इस बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्य वस्तुओं और मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों की कीमतों में आई तेजी है, जिस पर पश्चिम एशिया में जारी तनाव का सीधा असर पड़ा है। खासतौर पर ईंधन और बिजली सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जहां फरवरी में -3.78% की गिरावट थी, वहीं मार्च में यह 1.05% की वृद्धि में आ गया। कच्चे पेट्रोलियम की कीमतों में तो जबरदस्त उछाल देखा गया, जो 51% से ज्यादा बढ़ गईं, जो यह दिखाता है कि ग्लोबल एनर्जी मार्केट में कितनी तेजी आई है।
इसके साथ ही मैन्युफैक्चर्ड उत्पादों की महंगाई भी बढ़कर 3.39% हो गई, जिससे उद्योगों की लागत में इजाफा हुआ है और इसका असर आगे चलकर आम उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि खाद्य महंगाई में थोड़ी राहत दिखी, जो मार्च में 1.90% रही, लेकिन सब्जियों की कीमतों में अभी भी 1.45% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में 50% से ज्यादा उछाल आया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयातक देश पर पड़ रहा है। सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाकर कुछ राहत देने की कोशिश जरूर की है, लेकिन थोक स्तर पर ईंधन की कीमतें अभी भी ऊंची बनी हुई हैं।दूसरी तरफ खुदरा महंगाई यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) भी मार्च में बढ़कर 3.4% हो गई है, जो यह संकेत देता है कि महंगाई का दबाव धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंच रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि थोक महंगाई में यह तेजी आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई को और बढ़ा सकती है, क्योंकि कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इसके अलावा अल-नीनो और कमजोर मानसून की आशंका खाद्य कीमतों को और बढ़ा सकती है। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात यह दिखाते हैं कि महंगाई अभी नियंत्रण में नहीं है और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने पर वित्त वर्ष 2027 में WPI महंगाई औसतन 5% के आसपास रह सकती है, जिससे आम आदमी की जेब पर दबाव और बढ़ने की संभावना है।
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