करीब 30 लाख करोड़ रुपये के विशाल फंड को सुरक्षित रखने के लिए कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) एक नई और औपचारिक ‘निकास नीति’ तैयार करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य कम रेटिंग और जोखिम वाली कॉरपोरेट प्रतिभूतियों से समय रहते बाहर निकलना है। दरअसल, ईपीएफओ का बड़ा हिस्सा फिक्स्ड इनकम और कॉरपोरेट बॉन्ड्स में निवेशित है, जहां हाल के वर्षों में घटिया और तनावग्रस्त डेट की हिस्सेदारी बढ़ने से जोखिम भी बढ़ा है। दिसंबर 2025 तक संगठन का करीब एक बड़ा हिस्सा ऐसे डेट सेगमेंट में था, जिसमें कम गुणवत्ता वाली प्रतिभूतियों की मौजूदगी चिंता का विषय बन गई है। नई नीति के तहत यह तय किया जा सकता है कि जब किसी बॉन्ड या सिक्योरिटी की रेटिंग तय सीमा से नीचे गिर जाए, तो उसे कब और किस नुकसान की सीमा तक बेच दिया जाए, साथ ही यह जिम्मेदारी भी पोर्टफोलियो मैनेजर्स को दी जा सकती है कि वे समय पर सही फैसला लें।
इस कदम की जरूरत इसलिए भी महसूस हुई क्योंकि पहले रिलायंस कैपिटल और आईएल&एफएस जैसे मामलों में ईपीएफओ को निवेश बनाए रखने या बेचने का फैसला परिस्थितियों के आधार पर करना पड़ा था, जहां कम खरीदार और कमजोर बाजार के कारण बाहर निकलना मुश्किल साबित हुआ। कई बार ऐसी प्रतिभूतियां ब्याज देती रहती हैं, लेकिन उनकी गिरती रेटिंग के कारण उन्हें बेचने पर भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि नई निकास नीति में यह भी तय किया जाएगा कि नुकसान सहकर बिक्री कब जरूरी है और कब निवेश बनाए रखना बेहतर होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की स्पष्ट रणनीति से न सिर्फ जोखिम कम होगा, बल्कि ईपीएफओ जैसे बड़े निवेशक अपने सदस्यों के पैसों को ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी तरीके से मैनेज कर सकेंगे, जिससे भविष्य में फंड की स्थिरता और भरोसे को मजबूती मिलेगी।
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