Ministry of Coal ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए भूमिगत कोयला गैसीकरण (Underground Coal Gasification) के लिए नए और सख्त दिशानिर्देश जारी किए हैं। इस तकनीक के जरिए कोयले और लिग्नाइट को जमीन के अंदर ही सिंथेटिक गैस में बदला जाता है, जिससे पारंपरिक खनन की जरूरत कम होती है और सतह पर पर्यावरणीय प्रभाव भी घटता है।
इन नए नियमों के तहत हर परियोजना प्रस्तावक को विस्तृत खनन योजना मंत्रालय के सामने पेश करनी होगी, जिसमें भूवैज्ञानिक रिपोर्ट, जल-भूवैज्ञानिक अध्ययन और पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर पूरी जानकारी देना अनिवार्य होगा। अगर किसी कोयला ब्लॉक का पहले पर्याप्त अन्वेषण नहीं हुआ है, तो उसे मौजूदा मानकों के अनुसार पूरी तरह एक्सप्लोर करना होगा। साथ ही भूभौतिकीय सर्वे और बोरहोल डेटा का इस्तेमाल कर सटीक आकलन करना भी जरूरी किया गया है।
कोयला गैसीकरण तकनीक को भारत के लिए खास तौर पर अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे देश अपने मौजूदा कोयला संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकता है और सिंथेटिक गैस के रूप में वैकल्पिक ईंधन तैयार कर सकता है। इसका उपयोग बिजली उत्पादन, उर्वरक और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, ये दिशानिर्देश न केवल परियोजनाओं में पारदर्शिता और नियामक अनुपालन बढ़ाएंगे, बल्कि भारत को आयातित ईंधन पर निर्भरता कम करने और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने में भी मदद करेंगे।
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