देश के कई राज्यों में विकास से जुड़े खर्च की रफ्तार धीमी पड़ती दिख रही है। वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों (अप्रैल से फरवरी) में 22 राज्यों ने अपने बजट में तय पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) का केवल करीब 55 प्रतिशत ही खर्च किया। इसका मतलब है कि सड़कों, पुलों, बिजली, स्कूल जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर जितना पैसा खर्च होना चाहिए था, उसका लगभग आधा ही इस्तेमाल हो पाया। कुल मिलाकर इन राज्यों ने 10.22 लाख करोड़ रुपये के बजट के मुकाबले सिर्फ 5.65 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो साफ दिखाता है कि योजनाएं जमीन पर उतनी तेजी से लागू नहीं हो पाईं जितनी उम्मीद थी।
कई बड़े और अहम राज्य भी इस मामले में पीछे रहे। जैसे राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ने अपने पूंजीगत बजट का आधे से भी कम खर्च किया, जो चिंता की बात है क्योंकि ये राज्य आर्थिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दूसरी ओर कुछ राज्यों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया, जहां हरियाणा लगभग पूरा बजट खर्च करने के करीब पहुंच गया, जबकि हिमाचल प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश ने भी अच्छा काम किया। लेकिन पश्चिम बंगाल और मेघालय जैसे राज्यों का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा, जहां 40 प्रतिशत से भी कम खर्च हुआ।
अगर केंद्र सरकार से तुलना करें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। इसी अवधि में केंद्र ने अपने पूंजीगत व्यय का करीब 85 प्रतिशत खर्च कर दिया, यानी केंद्र की तुलना में राज्य काफी पीछे रहे। पिछले साल के मुकाबले भी स्थिति कमजोर दिखती है, क्योंकि वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों ने करीब 80 प्रतिशत पूंजीगत व्यय किया था, जबकि इस बार यह काफी कम रह गया है।
हालांकि राजस्व खर्च (जैसे वेतन, सब्सिडी, रोजमर्रा के खर्च) में राज्यों का प्रदर्शन ज्यादा स्थिर रहा। राज्यों ने अपने राजस्व व्यय का लगभग 75 प्रतिशत खर्च कर लिया, जिससे साफ है कि जरूरी और नियमित खर्च तो हो रहे हैं, लेकिन विकास से जुड़े बड़े निवेश में सुस्ती है। टैक्स कलेक्शन के मामले में भी राज्यों ने अच्छा प्रदर्शन किया और अपने लक्ष्य का 80 प्रतिशत से ज्यादा राजस्व जुटा लिया, फिर भी पूंजीगत खर्च कम रहना इस बात की ओर इशारा करता है कि या तो परियोजनाओं में देरी हो रही है या फिर फंड का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा।
कुल मिलाकर यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए चिंता पैदा करती है, क्योंकि पूंजीगत व्यय ही लंबी अवधि में विकास और रोजगार को बढ़ाता है। हालांकि आगे उम्मीद है कि केंद्र से मिलने वाले ज्यादा अनुदान और बेहतर प्लानिंग के जरिए राज्यों का पूंजीगत खर्च बढ़ सकता है, जिससे आने वाले समय में विकास की रफ्तार तेज हो सकती है।
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