पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक सप्लाई दबाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए एक व्यावहारिक रास्ता चुना है। अमेरिका द्वारा रूस और ईरान से तेल खरीद पर दी गई अस्थायी छूट को आगे न बढ़ाने के फैसले के बावजूद भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा। अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने साफ कर दिया कि 11 मार्च से पहले समुद्र में मौजूद तेल के लिए दी गई छूट अब खत्म हो चुकी है और इसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
हालांकि, भारतीय रिफाइनरियों ने पहले से ही अपनी रणनीति तैयार कर ली है। वे अब उन रूसी सप्लायर्स और जहाजों के जरिए तेल खरीदेंगी, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में नहीं आते। यानी भारत पूरी तरह से नियमों का उल्लंघन किए बिना, वैकल्पिक चैनलों के माध्यम से सस्ता और स्थिर तेल सप्लाई बनाए रखने की कोशिश करेगा। यह वही तरीका है, जिसे भारत पहले भी अपनाता रहा है।दरअसल, मार्च महीने में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद तेजी से बढ़ाई थी। ऊर्जा डेटा फर्म Kpler के अनुसार, मार्च में रूसी तेल आयात बढ़कर 20.6 लाख बैरल प्रतिदिन के 9 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जो फरवरी में 10.6 लाख बैरल प्रतिदिन था। अप्रैल में भी यह ट्रेंड जारी है, जहां अब तक करीब 16.7 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल भारत आ चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी छूट खत्म होने से सप्लाई थोड़ी टाइट जरूर हो सकती है, लेकिन भारत पर इसका बड़ा असर नहीं पड़ेगा। ICRA के विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियां पहले से ही ऐसी परिस्थितियों में काम करने की आदी हैं और उन्होंने अपने सोर्सिंग नेटवर्क को काफी विविध बना लिया है।
ईरान के मामले में स्थिति अलग है। भारत ने 2019 से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान से तेल खरीद बंद कर रखी है। हालांकि, पहले ईरान भारत के कुल आयात का करीब 11.5% हिस्सा था। अभी जो सीमित आयात हो रहा है, वह भी अस्थायी छूट के तहत है, जिसकी समय सीमा जल्द खत्म हो रही है।
इस बीच रूस भारत के लिए एक भरोसेमंद सप्लायर बना हुआ है। हाल ही में रूस के उप प्रधानमंत्री Denis Manturov की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत करने पर चर्चा हुई। रूस ने कच्चे तेल और एलएनजी की सप्लाई बढ़ाने का प्रस्ताव भी दिया है।हालांकि, एक अहम बदलाव यह है कि पहले भारत को रूसी तेल 8–10 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और भारत को 6–7 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके बावजूद, वैश्विक बाजार में अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट को देखते हुए रूस से तेल खरीद भारत के लिए अभी भी एक जरूरी और रणनीतिक विकल्प बना हुआ है।
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