पश्चिम एशिया में चल रहे संकट का असर भारत की एलएनजी (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) आपूर्ति पर साफ दिख रहा है, जिसके चलते देश को अपने आयात स्रोतों में बड़ा बदलाव करना पड़ रहा है। पहले जहां भारत मुख्य रूप से कतर जैसे पारंपरिक सप्लायर पर निर्भर था, वहीं अब रूस, नॉर्वे और अफ्रीकी देशों जैसे नए विकल्प तेजी से उभरकर सामने आ रहे हैं। संकट के कारण कतरएनर्जी द्वारा ‘फोर्स मेजर’ घोषित किए जाने के बाद भारतीय कंपनियों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू कर दी, जिससे सप्लाई चेन में विविधता आई लेकिन लागत भी बढ़ गई। जहाज-ट्रैकिंग डेटा के अनुसार अफ्रीकी देशों ने मार्च महीने में भारत के लिए रिकॉर्ड स्तर पर एलएनजी भेजी, जिसमें बड़ी संख्या में कार्गो शामिल हैं, हालांकि यह गैस पश्चिम एशिया के मुकाबले काफी महंगी पड़ रही है और आने में अधिक समय भी ले रही है।
इसी बीच, भारत ने लंबे अंतराल के बाद रूस और नॉर्वे से भी एलएनजी आयात की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। रूस की एक कंपनी से करीब दो साल बाद एलएनजी कार्गो आने की संभावना जताई जा रही है, जबकि नॉर्वे से भी कई वर्षों बाद गैस की आपूर्ति शुरू होने जा रही है। नॉर्वे की सरकारी कंपनी इक्विनोर से दीर्घकालिक समझौते भी किए गए हैं, जिससे आने वाले वर्षों में नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी।
हालांकि, रूस से आयात को लेकर प्रतिबंधों और वैश्विक राजनीतिक दबाव की वजह से स्थिति जटिल बनी हुई है। भारत आमतौर पर प्रतिबंधित स्रोतों से खरीद से बचता है, लेकिन मौजूदा आपूर्ति दबाव के कारण विकल्प सीमित हो गए हैं। इस बीच चीन जैसे देश प्रतिबंधों की अनदेखी कर ऐसे स्रोतों से खरीद जारी रखे हुए हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत का एलएनजी आयात हाल के महीनों में घटा भी है, जो दर्शाता है कि आपूर्ति में अनिश्चितता बनी हुई है। कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया संकट ने भारत को अपनी ऊर्जा रणनीति में बदलाव करने के लिए मजबूर किया है, जहां अब एक ही स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय कई देशों से गैस खरीदने पर जोर दिया जा रहा है। यह रणनीति भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकती है, लेकिन फिलहाल इसके साथ लागत और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।
Dharmakshetra, Shiv Shakti Mandir, Babu Genu Marg,
Sector 8, Rama Krishna Puram,
New Delhi, Delhi 110022
+91 80031 98250
info@mysba.co.in