FDI के जरिए न्यूक्लियर सेक्टर खोलने की तैयारी, लेकिन निजी कंपनियों की कम रुचि बनी बड़ी चुनौती

भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलने की तैयारी जितनी बड़ी दिखती है, उतनी आसान नहीं हैऔर अभी सरकार की सबसे बड़ी समस्या यही है कि निजी कंपनियां इसमें उतनी दिलचस्पी नहीं दिखा रहीं जितनी उम्मीद थी।सरकार अब न्यूक्लियर पावर सेक्टर में FDI (विदेशी निवेश) लाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। यह कदम देश की बढ़ती बिजली जरूरतों और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। हाल ही में हुई एक उच्चस्तरीय कार्यशाला में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने साफ किया कि FDI नीति को मंजूरी मिल चुकी है और अब इसे अलग-अलग मंत्रालयों के बीच चर्चा (इंटर-मिनिस्ट्री कंसल्टेशन) के लिए भेजा गया है। इसका मतलब है कि नीति अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है।

सरकार का लक्ष्य 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करना है। लेकिन इसके लिए भारी निवेश की जरूरत है—अनुमान है कि करीब 20 लाख करोड़ रुपये जुटाने होंगे। एक परमाणु संयंत्र की लागत भी काफी ज्यादा होती है, लगभग 22 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट के हिसाब से। इसलिए सरकार चाहती है कि विदेशी निवेश और निजी कंपनियां मिलकर इस फंडिंग गैप को भरें।लेकिन यहीं सबसे बड़ी चुनौती सामने आ रही है। NTPC के चेयरमैन गुरदीप सिंह ने साफ कहा कि कानून पास होने के बावजूद निजी क्षेत्र में वह उत्साह नहीं दिख रहा है, जिसकी उम्मीद की गई थी। राज्यों की तरफ से भी धीमी प्रतिक्रिया मिल रही है—हालांकि केंद्र हर राज्य में कम से कम एक न्यूक्लियर प्लांट साइट पहचानने को कह चुका है, लेकिन अभी तक सिर्फ लगभग 14 राज्यों के साथ ही काम आगे बढ़ पाया है और स्वीकृति दर भी कम है।

इसके पीछे कई वजहें हैं। परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में लंबा समय, भारी लागत, सुरक्षा जोखिम और जटिल नियम होते हैं, जिससे निजी कंपनियां हिचकती हैं। इसके अलावा बिजली की लागत (टैरिफ) भी एक मुद्दा है—अभी नए प्लांट्स से बनने वाली बिजली का दाम करीब ₹5.50 से ₹6.50 प्रति यूनिट बताया जा रहा है, जो अन्य स्रोतों (जैसे सोलर) से ज्यादा है।सरकार अब इस सेक्टर को आकर्षक बनाने के लिए नए फाइनेंसिंग मॉडल, “फ्लीट मोड” (एक साथ कई रिएक्टर लगाने) और मंजूरी प्रक्रिया को तेज करने जैसे कदमों पर काम कर रही है। अगर ये बदलाव सफल होते हैं, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है और कोयले पर निर्भरता भी कम होगी।

कुल मिलाकर, दिशा तो तय हैलेकिन निजी निवेशकों का भरोसा जीतना अभी सबसे बड़ी परीक्षा बना हुआ है।


Manisha Saini
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