किसानों के लिए यह फैसला राहत देने वाला जरूर है, लेकिन पूरी तस्वीर समझना जरूरी हैयह केवल “छूट” नहीं बल्कि जिम्मेदारी के साथ आने वाली राहत है।
केंद्र सरकार ने 2026-27 के गेहूं विपणन सत्र के लिए बेमौसम बारिश से प्रभावित फसल को ध्यान में रखते हुए गुणवत्ता मानकों में बड़ी ढील दी है, खासकर पंजाब और चंडीगढ़ में। अब भारतीय खाद्य निगम (FCI) ऐसे गेहूं को भी खरीदेगा जिसमें चमक कम हो गई हो या दाने सिकुड़ गए हों। पहले जहां सिकुड़े हुए दानों की सीमा काफी कम थी, अब इसे बढ़ाकर लगभग 15% तक स्वीकार किया जाएगा। साथ ही हल्के और आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त दानों को भी सीमित मात्रा में खरीदने की अनुमति दी गई है। इसका सीधा फायदा किसानों को मिलेगा, क्योंकि खराब मौसम के कारण उनकी फसल की गुणवत्ता गिर गई थी और उन्हें MSP पर बेचने में परेशानी हो रही थी।
सबसे अहम बात यह है कि इस ढील के बावजूद किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) यानी ₹2,585 प्रति क्विंटल पर ही पूरी खरीद मिलेगी। इसका मतलब है कि गुणवत्ता थोड़ी खराब होने के बावजूद किसानों की आय पर सीधा असर नहीं पड़ेगा और उन्हें बाजार में नुकसान झेलने से बचाया जाएगा।
हालांकि इस फैसले के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जोड़ी गई है—रियायती मानकों के तहत खरीदे गए गेहूं को अलग से स्टोर करना होगा और उसकी गुणवत्ता में आगे कोई गिरावट होती है तो इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार, खासकर पंजाब सरकार पर होगी। इसके अलावा, इस तरह के गेहूं की खरीद, भंडारण और उससे जुड़ी अतिरिक्त लागत भी राज्य को ही उठानी पड़ेगी।
सरल शब्दों में समझें तो केंद्र ने किसानों को राहत देने के लिए खरीद के दरवाजे खोल दिए हैं, लेकिन गुणवत्ता से जुड़े जोखिम और खर्च का बोझ राज्यों पर डाल दिया है। इससे एक तरफ किसानों को तुरंत फायदा मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ राज्यों के लिए वित्तीय और प्रबंधन की चुनौती भी बढ़ेगी।
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