समुद्र के नीचे छिपे अरबों रुपये के खनिज खजाने के बावजूद भारत अभी तक उनका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहा है, और इसकी सबसे बड़ी वजह नीतिगत कमजोरियां बताई जा रही हैं। संसद की स्थायी समिति (कोयला, खनन और स्टील) ने अपनी 23वीं रिपोर्ट में साफ कहा है कि अपतटीय (समुद्र तट के बाहर) खनन क्षेत्र में भारी संभावनाएं होने के बावजूद निवेशकों की रुचि बेहद कम रही है, जिसका मुख्य कारण स्पष्ट नीति और मजबूत फंडिंग ढांचे का अभाव है। रिपोर्ट के अनुसार, जब सरकार ने पहली बार अपतटीय खनन ब्लॉकों की नीलामी की, तो उम्मीद के विपरीत कंपनियों ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिससे यह साफ संकेत मिला कि मौजूदा व्यवस्था निवेश के अनुकूल नहीं है।
समिति ने जोर देकर कहा कि समुद्र तल में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज—जो भविष्य की तकनीक, ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास के लिए बेहद जरूरी हैं—भारत के लिए एक बड़ा अवसर हैं, लेकिन इनके दोहन के लिए ठोस रणनीति की कमी है। इसलिए समिति ने खान मंत्रालय को सलाह दी है कि वह एक समर्पित “अपतटीय खनिज अन्वेषण नीति” तैयार करे, जिसमें अलग फंडिंग सिस्टम और विभिन्न मंत्रालयों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित किया जाए। खास तौर पर पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण जैसी एजेंसियों के साथ समन्वय को मजबूत करने की जरूरत बताई गई है। कुल मिलाकर, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि अगर भारत सही नीति, निवेश आकर्षण और तकनीकी सहयोग पर ध्यान दे, तो समुद्र के नीचे छिपा यह खजाना देश की दीर्घकालिक संसाधन सुरक्षा और आर्थिक मजबूती का बड़ा आधार बन सकता है।
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