पश्चिम एशिया में तनाव, खासकर ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रम, ने भारत की अर्थव्यवस्था की एक ऐसी “छिपी कमजोरी” को उजागर कर दिया है जो अब तक कम तेल कीमतों के कारण नजर नहीं आ रही थी। लेख में अर्थशास्त्री टी टी राम मोहन यह समझाते हैं कि भले ही भारत ने पिछले तीन वर्षों में मजबूत आर्थिक वृद्धि दिखाई—लगातार लगभग 7% के आसपास—लेकिन यह मजबूती काफी हद तक अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों (कम तेल कीमतें, नियंत्रित मुद्रास्फीति) पर निर्भर थी, न कि पूरी तरह आंतरिक स्थिरता पर। जैसे ही ईरान संघर्ष ने तेल बाजार को झटका दिया, रुपये में गिरावट तेज हुई और विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाने लगा।
असल समस्या तेल कीमतों से जुड़ी है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो देश का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) तेजी से बढ़ता है। पहले जहां यह जीडीपी के करीब 0.8% था, अब इसके 1.8%–2% तक जाने का खतरा है—और अगर तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है तो स्थिति और खराब हो सकती है। यह बदलाव विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ा संकेत है कि भारत में निवेश पर रिटर्न रुपये के अवमूल्यन से प्रभावित हो सकता है, इसलिए वे पैसा निकालने लगते हैं। यही वजह है कि भारी एफपीआई (Foreign Portfolio Investment) निकासी देखी गई।
रुपये की कमजोरी भी इसी का परिणाम है। दिलचस्प बात यह है कि यह गिरावट उस समय हो रही है जब भारत की वृद्धि दर ऊंची और मुद्रास्फीति अपेक्षाकृत कम है—यानि पारंपरिक आर्थिक संकेतक मजबूत हैं। इसका मतलब साफ है: समस्या “बेसिक फंडामेंटल्स” में नहीं, बल्कि बाहरी जोखिमों (external vulnerabilities) में है। खासकर तेल पर निर्भरता भारत को वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
नीतिगत स्तर पर विकल्प सीमित हैं। सरकार तेल की कीमतें सीधे नियंत्रित नहीं कर सकती—वह केवल आपूर्ति सुनिश्चित कर सकती है और उपभोक्ताओं पर असर कम करने की कोशिश कर सकती है। वहीं भारतीय रिज़र्व बैंक रुपये की गिरावट को पूरी तरह रोक नहीं सकता, सिर्फ उसकी गति को नियंत्रित कर सकता है। अगर हालात बिगड़ते हैं, तो उसे ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ेगा।
लेख का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भारत को अपनी “उच्च विकास दर” की महत्वाकांक्षा पर थोड़ा संयम रखना होगा। लगातार 7% से अधिक वृद्धि हासिल करने की कोशिश, खासकर अस्थिर वैश्विक माहौल में, अर्थव्यवस्था को अनावश्यक जोखिमों में डाल सकती है। बेहतर रणनीति यह होगी कि स्थिरता को प्राथमिकता दी जाए—even अगर इसका मतलब थोड़ा कम विकास दर ही क्यों न हो।सरल शब्दों में भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं। तेल कीमतों जैसे बाहरी झटके यह दिखा रहे हैं कि तेज विकास के साथ-साथ “संतुलन और सावधानी” भी उतनी ही जरूरी है।
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