130 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच जाती हैं, तब भी भारत की जीडीपी ग्रोथ करीब 6.3% बनी रह सकती है। सामान्य परिस्थितियों में, यानी जब तेल की कीमतें लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हों, तब यह वृद्धि दर 7.1% रहने का अनुमान है। इसका मतलब साफ है कि वैश्विक अनिश्चितता और महंगे तेल के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रह सकता है। एजेंसी के अनुसार, यह प्रदर्शन अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले काफी मजबूत माना जाएगा।
हालांकि, रिपोर्ट में कुछ अहम जोखिमों की भी चेतावनी दी गई है। सबसे बड़ा खतरा ऊर्जा कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी से जुड़ा है, जिससे भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। महंगा कच्चा तेल सीधे तौर पर आयात बिल बढ़ाता है, जिससे रुपये पर दबाव आता है और महंगाई बढ़ती है। इससे आम लोगों की क्रय शक्ति घट सकती है और कंपनियों की लागत बढ़ने से उनका मुनाफा कम हो सकता है। खासकर रिफाइनिंग और एविएशन सेक्टर पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका जताई गई है, जबकि सीमेंट, स्टील और धातु जैसे ऊर्जा-निर्भर सेक्टर भी जोखिम में हैं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो देश की बड़ी कंपनियों की कमाई में 15–20% तक गिरावट आ सकती है। इससे उनका कर्ज बढ़ सकता है और वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ेगा। बैंकिंग सेक्टर पर भी इसका असर दिख सकता है—वाहन ऋण, किफायती आवास और जोखिम वाले लोन में गिरावट आ सकती है, जबकि एनपीए (खराब कर्ज) में हल्की बढ़ोतरी संभव है।
सरकार के सामने भी चुनौती बढ़ेगी, क्योंकि महंगाई को नियंत्रित करने और जनता को राहत देने के लिए उसे सब्सिडी पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। इससे राजकोषीय घाटा बढ़ने का दबाव बनेगा। फिर भी S&P Global Ratings का मानना है कि भारत की संप्रभु क्रेडिट रेटिंग (BBB) पर तत्काल कोई खतरा नहीं है, क्योंकि सरकार लंबे समय में वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और जरूरत पड़ने पर खर्चों में समायोजन कर सकती है।
एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि Export-Import Bank of India के अनुसार पश्चिम एशिया संकट के बावजूद भारतीय कंपनियों की कर्ज चुकाने की क्षमता अभी तक प्रभावित नहीं हुई है। इसका कारण उनके राजस्व स्रोतों का विविधीकरण है, जिससे वे केवल एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं हैं। हालांकि, अगर वैश्विक तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो आगे चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत नींव पर खड़ी है और वैश्विक झटकों को झेलने की क्षमता रखती है, लेकिन महंगा तेल और वैश्विक तनाव आगे चलकर विकास की रफ्तार को थोड़ा धीमा कर सकते हैं।
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