स्वदेशी भाषाओं को शिक्षा-रोजगार से जोड़कर और द्विभाषी किताबों से बचेगी जनजातियों की संस्कृति

Varanasi के राजघाट स्थित Vasant Mahila Mahavidyalaya में आयोजित दो दिवसीय सम्मेलन और राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि जनजातीय भाषाओं—जैसे संथाली, मुंडारी और हो—को बचाने का सबसे प्रभावी तरीका उन्हें शिक्षा और रोजगार से जोड़ना है। कार्यक्रम का उद्घाटन Bibhuti Bhushan Malik ने किया, जहां उन्होंने कहा कि ये भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि जनजातीय समुदायों की पहचान, परंपरा और ज्ञान की मूल आधारशिला हैं। सम्मेलन में 100 से अधिक शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए, जिनमें देश के विभिन्न राज्यों—बिहार, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम, राजस्थान और कर्नाटक—से आए विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और डिजिटल व सांस्कृतिक नवाचार के जरिए इन भाषाओं के संरक्षण के उपायों पर चर्चा की।

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि अगर इन भाषाओं को स्कूलों और उच्च शिक्षा में पढ़ाई का माध्यम बनाया जाए और इन्हें रोजगार से जोड़ा जाए, तो नई पीढ़ी में इनके प्रति रुचि स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। इसके साथ ही द्विभाषी किताबों (स्थानीय भाषा + हिंदी/अंग्रेजी) को एक प्रभावी समाधान बताया गया, जिससे छात्र अपनी मातृभाषा के साथ मुख्यधारा की भाषा में भी दक्ष हो सकें। संगोष्ठी में यह भी रेखांकित किया गया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म—जैसे ई-लर्निंग, मोबाइल ऐप और ऑनलाइन कंटेंट—जनजातीय भाषाओं को संरक्षित और प्रसारित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। Indian Council of Social Science Research के सहयोग से आयोजित इस पहल को अकादमिक जगत में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो जनजातीय भाषाओं और संस्कृति को आधुनिक दौर में जीवित और प्रासंगिक बनाए रखने की दिशा में नई राह खोलता है।


Manisha Saini
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