पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक अनिश्चितता के बीच दुनिया की नजरें इस संकट के जल्द समाधान पर टिकी हैं, क्योंकि इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर पड़ रहा है। अगर यह संकट जल्दी सुलझता है, तो दुनिया को आर्थिक स्थिरता मिल सकती है और देश अपनी आंतरिक आर्थिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की हालिया ‘फिस्कल मॉनिटर’ रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी देती है कि वैश्विक सार्वजनिक कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में यह कर्ज वैश्विक जीडीपी का 94% तक पहुंच चुका है और 2029 तक 100% के स्तर को छू सकता है, जो आखिरी बार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद देखा गया था। इसका मतलब है कि दुनिया फिर से उच्च कर्ज के दौर में प्रवेश कर रही है, जिसका असर लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।
उच्च ब्याज दरों के दौर में सरकारों के लिए कर्ज का बोझ और बढ़ गया है, क्योंकि उन्हें पुराने कर्ज को नए और महंगे कर्ज से बदलना पड़ रहा है। इसके चलते कई देशों में ब्याज भुगतान जीडीपी के 2% से बढ़कर लगभग 3% तक पहुंच गया है। यह वृद्धि छोटी नहीं है—सिर्फ 1% की बढ़ोतरी का मतलब है कि सरकारों को विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में खर्च कम करना पड़ेगा, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। खासकर संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे बड़े देश में बजट घाटा 7-8% तक बना हुआ है, जो वैश्विक पूंजी का बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींच सकता है। इससे बाकी देशों, खासकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए निवेश महंगा और कठिन हो जाता है।
भारत के संदर्भ में यह स्थिति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि भारत अभी भी चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) से जूझ रहा है और अपनी निवेश जरूरतों को पूरा करने के लिए विदेशी पूंजी पर निर्भर है। यदि वैश्विक पूंजी का बड़ा हिस्सा अमेरिका जैसे देशों में चला जाता है, तो भारत में पूंजी का प्रवाह घट सकता है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ेगा और भुगतान संतुलन की स्थिति कमजोर हो सकती है। हालांकि तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में विदेशी बचत का उपयोग करना सामान्य माना जाता है, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात यह संकेत देते हैं कि भारत को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।
आईएमएफ के अनुमानों के अनुसार भारत का सरकारी कर्ज 2025 में जीडीपी के लगभग 84% से घटकर 2031 तक 77.7% हो सकता है, जबकि बजट घाटा 7.4% से घटकर 6.6% तक आने की उम्मीद है। यह सुधार सकारात्मक है, लेकिन पर्याप्त नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने कर्ज और घाटे को तेजी से कम करने की दिशा में काम करना चाहिए ताकि भविष्य में किसी आर्थिक झटके की स्थिति में सरकार के पास नीतिगत विकल्प (policy space) उपलब्ध रहें।अंततः, भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यह है कि उसे विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम करते हुए घरेलू बचत को बढ़ाना होगा। यदि सरकार खुद कम कर्ज लेती है, तो निजी क्षेत्र के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध होंगे, जिससे निवेश बढ़ेगा और पूंजी की लागत कम होगी। एक अनिश्चित वैश्विक माहौल में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।
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