भारत की बात करें तो स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर दिख रही है। SBI रिसर्च के अनुसार भारत इस संकट में मजबूरी नहीं बल्कि मजबूती की स्थिति से प्रवेश कर रहा है। वित्त वर्ष 2026 में लगभग 7.6% की विकास दर यह दिखाती है कि देश की आर्थिक नींव मजबूत है। पहले भी रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संकट के समय भारत ने अच्छी ग्रोथ दिखाई थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि खतरा खत्म हो गया है महंगे तेल से भारत का आयात बिल बढ़ेगा, चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और महंगाई पर दबाव आएगा। साथ ही सरकार पर सब्सिडी और खर्च का बोझ भी बढ़ सकता है।
इस पूरे परिदृश्य में एक और बड़ा खतरा उभर रहा है El Niño। वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार “सुपर एल नीनो” बनने की संभावना बढ़ रही है, जो बहुत कम बार आता है लेकिन जब आता है तो वैश्विक मौसम को बुरी तरह प्रभावित करता है। इसका असर भारत पर खास तौर पर इसलिए गंभीर माना जाता है क्योंकि यह मानसून को कमजोर कर सकता है। रिपोर्ट बताती है कि एल नीनो के दौरान भारत के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 20–25% तक कम हो सकती है। इससे खेती, खाद्य उत्पादन और ग्रामीण आय पर असर पड़ता है, जो अंततः पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। हालांकि अब कृषि में विविधता (डेयरी, बागवानी आदि) बढ़ने से असर पहले जितना भारी नहीं रहता, फिर भी जोखिम बना रहता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ एल नीनो अपने आप में भारत की जीडीपी को बहुत ज्यादा नहीं गिराता, लेकिन अगर इसके साथ सूखा भी जुड़ जाए, तो असर बढ़ जाता है। SBI के मॉडल के अनुसार सामान्य स्थिति में असर बहुत कम होता है, लेकिन खराब हालात में जीडीपी पर 20 से 65 बेसिस पॉइंट तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।कुल मिलाकर, दुनिया मंदी की ओर जा सकती है या नहीं—यह अभी पूरी तरह तय नहीं है, लेकिन खतरे जरूर बढ़ गए हैं। भारत फिलहाल मजबूत स्थिति में है, लेकिन तेल की कीमतें, वैश्विक तनाव और मौसम—ये तीनों अगर एक साथ बिगड़ते हैं, तो भारत भी पूरी तरह अछूता नहीं रह पाएगा।
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